Wednesday, August 23, 2017

कटे हुए पंख

कटे हुए पंख

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

एक निरंकुश बादशाह को मरते समय उसके बाप ने कहा, बेटा,प्रजा शेर होती है.बादशाह की कुशलता इसी में है कि शेर पर सवार रहे. नीचे उतरने का मतलब है मौत. इसलिए यह ध्यान रखना कि लोग गुलामी के आगे कुछ न सोच सकें. जनता में जो सरदार प्रसिद्ध हो जाय उसे रास्ता का कांटा समझकर हटा देना. बेटे ने बाप की शिक्षा का पालन किया और सबसे बूढ़े वजीर को हवालात में बंद कर दिया. बूढा वजीर आज तक सारे शासन का सूत्रधार था.
इसी बीच कहीं से उड़ता हुआ एक तोता राज्य में आ पहुँचा. उसने चारों दिशाओं में उडकर कहना शुरू कर दिया ,  गुलाम बने रहना सबसे बड़ी कायरता है. चुप रहकर सहना सबसे बड़ा पाप है.
प्रजा में खुसुर-पुसुर शुरू हो गई. तोते की वाणी को देव वाणी समझकर लोग एकजुट होने लगे. बादशाह को भी सुराग मिल गया. उसने तोते को पकडवाकर पिंजरे में बंद करवा दिया.
क्रुद्ध जनता ने तोते को मुक्त करने की आवाज उठाई तो बादशाह ने वाहवाही लूटने के लिए उसे पिंजरे से मुक्त कर दिया. तोता उडकर दूर के वृक्ष पर जा बैठता, इसके पूर्व ही प्रजा बादशाह की दरियादिली का बखान करती हुई लौट आई.

परन्तु तोता उड़ न सका. वह धीरे-से पिंजरे के पास बैठ गया था: क्योंकि उसके पंख मुक्त होने से पहले काट
दिए गए थे.   

Sunday, June 4, 2017

लघुकथा का रचना विधान
भगीरथ
लघुकथा जहां तक लोक, बोध, नीति और उपदेश तक सीमित रहती है उसका कलेवर, उसकी भाषा और शैली भी बहुत हद तक कथ्य की उद्देश्यपरकता से प्रभावित होती है उसमें कथा- क्रम रोचक होता है और अंत में पूरी कहानी के कथ्य को नीति वाक्य में निचोड़ कर कह दिया जाता है।
पंचतन्त्रीय कथाओं का उद्देश्य जीव - जन्तुओं की प्रकृति एवं मनुष्य के चारित्रिक लक्षणों में साम्यता स्थापित कर , कुछ उपदेशात्मक बातें या व्यवहारिक सीख देने का रहा है। इन कथाओं के रचनात्मक विधान में प्रतीकात्मक व प्रक्षेपणात्मक शैली का प्रयोग हुआ है और इसलिए ही ये साहित्य की अद्वितीय रचनाएं सिद्ध हुई है।
वर्तमान में जीवन की परिस्थतियों एवं मानवीय संबधों की जटिलता की वजह से नीतिकथाएं, जो परिस्थतियों और मानवीय संबंधों के द्वंद्व का अति सरलीकृत एंव फार्मूलाबद्ध रूप है अब अप्रासांगिक हो गई है।
नीतिकथाओं में कथोपकथन शैली का भी व्यापक प्रयोग हुआ है  जिसे रचना की उद्देश्यपरकता के परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखकर रचना में व्यवस्थित किया जाता है।
जिब्रान की रूपक कथाओं की भाषा शैली में प्रतीकात्मकता ओर व्यजंनात्मकता  की शक्ति के कारण वे साहित्य में अद्वितीय रचनाएं सिद्ध हुई है उनके कथ्य शाश्वत है और इसी कारण अमूर्त एवं रहस्यवादी बन गई है रचनाएं ।
हिन्दी की प्रारम्भिक लघुकथाओं में शैली के स्तर पर या कथ्य के स्तर पर कोई नई जमीन नहीं तोड़ी गई चाहे रचनाकार जगदीशचन्द्र मिश्र रहे हो या रावी ।
लेकिन आठवें दशक के आते - आते लघुकथा अभिव्यक्ति की विवशता के रूप में प्रस्फुटित हुई। क्योंकि जीवन  का तल्ख यथार्थ अभिव्यक्ति चाहता था। अतः आठवें दशक की लघुकथा यथार्थ की जमीन पर खड़ी दिखी । कथ्य की विविधता ने लघुकथा में नई जमीन तोड़ी और शैली के स्तर पर व्यापक प्रयोग हुए भाषा गठन में भी बदलाव आया। क्योंकि अब लघुकथाकार का उद्देश्य साम्प्रतिक जीवन के यथार्थ को कथा में प्रस्तुत करता था न कि कोई उपदेश या दृष्टांत देना था।
लघुकथा का पूरा आन्दोलन अव्यवसायिक पत्रिकाओं और नये रचनाकारों ने चलाया व्यवसायिक जगत में लघुकथा की कोई पहचान नहीं थी । कालान्तर में व्यवसायिक जगत ने इस आन्दोलन के परचम को थामने की कोशिश की लेकिन उसमें उन्हें मामूली सफलता ही मिली सारिका के लघुकथांक और श्रेष्ठ लघुकथाएं, एंव समान्तर लघुकथाओं के प्रकाशन ने यह साबित किया कि व्यवसायिक जगत केवल लघुकथा के नाम पर व्यंग्य लघुकथा या व्यंग्य रचनाओं से ही वाकिफ है। और आठवें दशक में लघुकथा जो तस्वीर अव्ययवसायिक पत्रिकाएं प्रस्तुत कर रही थीं उनका कोई उल्लेख उनमें नहीं था इस कारण भी लघुकथांक व पुस्तकों में व्यंग्य लेखकों को ही स्थान मिला ।
हरशिंकर परसाई ने व्यंग्य लघुकथाएं भी लिखी है और उनका अधिकतर लेखन व्यंग्य रचनाओं के नाम से जाना जाता है जिसमें कथातत्व की प्रमुखता न हो कर भाषा  व्यञ्जकता    और शैली की व्यंग्यात्मकता है। हरिशंकर परसाई के लिए व्यंग्य  कोई हास्य की वस्तु नहीं है हालांकि उपहास उन्होंने जरूर उडाया है जिन्हें व्यंग्यरचनाएं एवं लघुकथा का फर्क मालूम नहीं है उन्हें परसाई की लघुकथाएं और व्यंग्य रचनाओं को साथ - साथ रख कर पढ़ना चाहिए।
अव्यवसायिक क्षेत्रों में यथार्थ के साथ व्यंग्य था लेकिन जब हम किसी विधा का अंक प्रकाशित कर रहे हो तो इतना तो ध्यान रखा जाना चाहिए व विधा की समग्र तस्वीर प्रस्तुत करें ।
लेकिन रमेश बत्रा के संपादन में साहित्य निर्भर तारिका लघुकथांकों ने लघुकथा को ईमानदारी से पेश किया यह पहली बार था कि लघुकथा को साहित्य जगत में ठीक से प्रस्तुत किया गया उसके बाद तो लघुकथांकों  की अच्छी परम्परा है।
व्यवसायिक क्षेत्रों में व्यंग्य कथा के अन्तर्गत पैरोडी कथाओं का भी व्यापक प्रयोग हुआ लेकिन एक सीमा के बाद वे निरर्थक साबित होने लगी क्योंकि उनमें पौराणिक कथाओं के निष्कर्षो पर आधुनिक पात्र थोपे गये मूल्यों में आए पतन को दर्शाने की इन लघुकथाओं ने कोशिश अवश्य की लेकिन अपेक्षाकृत सरलीकृत तरीके से ये लघुकथाएं लिखी गई अतः प्रकान्तर में वे अनुपयोगी होकर रह गई।
घटना कथा व व्यथा कथा के नाम से व्यवसायिक क्षेत्रों में लघुकथा लिखी जाने लगी जो केवल घटना की रिपोर्टिंग होती थी। उसमें लघुकथा के रूप विन्यास पर कोई मेहनत नहीं होती थी भाषा भी पूर्ण अखबारी होती थी यथार्थ तो था लेकिन ललित    साहित्य नहीं।
लगातार तनाव की स्थिति को  भोगती रचनाएं  क्लाइमेक्स से आरम्भ हो - उसी स्तर पर यात्रा कर  वहीं समाप्त हो जाती है ऐसी लघुकथाएं पाठक को पकड़े रहने में सक्षम होती है ।
कभी - कभी लघुकथा तेजी से चरमोत्कर्ष की ओर दौड़ती हे और अप्रत्याशित ही समाप्त हो जाती है। यहां पाठक स्तम्भित, भौंचक, सम्मोहित या चौंक पड़ता है। ऐसी रचनाएं लघुकथा में काफी सफल होती है क्योंकि इनका कथ्य धारदार और उसका प्रकटीकरण भी उतना ही सशक्त।प्रभावी डायलाॅग के रूप में लिखी रचनाएं, एक स्थिति को प्रकट करती है। जिसमें कथोपकथन के जरिए ही कथा का विकास व पात्रों के भावों की अभिव्यक्ति होती है। रमेश बतरा की माएं और बच्चे सिमिर की हथकंडे कृष्णा अग्निहोत्री की मातम ऐसी ही रचनाएं है।
मशकूर जावेद ने अपनी रचना केबरे व इस लेखक की रचना हड़ताल में वाक्यों के अभाव और शब्दों के मोजेक वर्क से लघुकथा का कम्पोजीशन उभारा है। आयातित संस्कृति के खोखलेपन एवं सेक्स के व्यवसायीकरण को उजागर करने लूटमार सभ्यता की पथराई आत्मा - जो वस्तुओं में अपनी संतुष्टि खोजकर समूची मानव जाति से आंखे मूंद अपने जीवन की इतिश्री समझ लेते है- ऐसे कथ्य को इस शैली के माध्यम से सशक्त अभिव्यक्ति दी है ।
      गोल दायरा/लड़की/थिरकती हुई/लड़की/आरकेस्ट्रा/मेरी नजरें/लड़की/नाचती हुई/कपड़े/लड़की बिना कपड़े/लड़की/कपड़े/खोलती हुई/लड़की।
      लघुकथा में नरेटिव (विवरणात्मक) शैली का काफी प्रयोग हुआ है मगर इस शैली में लिखी गई रचनाएं अक्सर लचर पाई गई लोककथाओं में इस शैली का  विशेष उपयोग होता है। लेकिन लोककथाओं की  रोचकता एवं उत्सुकता तत्व ने  पाठकों पर अपनी पकड़ बनाए रखी   । जबकि विवरणात्मक लघुकथाओं ने  पाठकों पर अपनी पकड़ बनाने की क्षमता खो दी
      घटना और स्थितियों के स्थूल वर्णन का लघुकथा में स्थान नहीं होता ऐसे में सांकेतिकता और व्यंजनात्मकता के सहारे रचना की सृष्टि कर लेना लेखक के लिए उपलब्धि है । लेकिन कई बार इनके बिना भी सपाट बयानी में सशक्त अभिव्यक्ति देना रचनाकार के लिए संभव  है। जैसे प्रभासिंह की सत्याग्रही”” मोहन राजेश की परिष्कृत, व कृष्ण कमलेश की यकीन, आज की लघुकथा दुराव - छुपाव का अवसर न देकर पाठक के आमने सामने होती है और सड़ी गली व्यवस्था पर सीधे चोट करती है। ऐसी रचनाएं तीखे कथ्य और दो टूक भाषा की अपेक्षा करती है।
कथा तत्वों से विहीन होते हुए भी कुछ रचनाएं विचार के स्तर पर रूपायित होती है वे मात्र एक रचना प्रक्रिया होती है जो विवेक पूर्ण एवं स्थिति सापेक्ष होती है । इसमें ठोस कथा की जगह मात्र कथा सूत्र होते हैं। लेखक की टूल कछुए ऐसी ही विचार कथाएं है!
रूपक कथाओं में दो समान्तर कथाएं चलती हैं एक प्रत्यक्ष और दूसरी अप्रत्यक्ष (सूक्ष्म) जैसे डिसीप्लीन - पुरूषोत्तम चक्रवर्ती  प्रतिबंध - शंकुतला किरण, भूख - जगदीश कश्यप आदि
प्रतीकों का प्रयोग लघुकथा लेखन में काफी हुआ है। कईं रचनाएं  जो प्रतीकात्मक होती है वहां कथ्य के अमूर्तिकरण के कारण संप्रेषणीयता कुछ हद तक बाधित हो जाती है फिर भी लेखक कभी - कभी अपने कथ्य को प्रभावी बनाने में प्रतीक की विवशता महसूस करता है। आज के दर्दनाक यर्थाथ और उनसे जूझते इन्सानों के संघर्ष  पलायन और प्रतिक्रियाओं का लेखा- जोखा प्रस्तुत करने में प्रतीक बहुत सहायक होते है प्रतीकों के अभाव में ये रचनाएं अनावश्यक लम्बी होकर उबाऊ एवं प्रभावहीन हो जाएगी रमेश जैन की मकान ब्रजेश्वरमदान की मरे हुए पैर  अनिल चौरसिया की कालासूरज आदि।
फैंटेसी का प्रयोग अक्सर प्रतीकों के साथ होता है लेकिन लघुकथा अपने आंतरिक बुनावट में फैंटेसी का उपयोग करती है। अपनी विचित्र स्थितियों के बावजूद वे यथार्थ का अवलोकन है रमेश बतरा की खोया हुआ आदमी, भगीरथ की दोजख और जगदीश कश्यप की चादर।
जो सबसे ज्यादा प्रचलित रचना विधान दो विपरित परिस्थितियों को आमने - सामने कर देना, विरोधाभासों और विडम्बनाओं को कथा में उतार देना इस शैली कि सैकड़ों रचनाएं लघुकथा साहित्य में मिल जायेगी । यह शैली इतनी रूढ़ हो गई हैं कि अब उसका उपयोग कम ही होता है फिर नये लेखकों द्वारा इसका सार्थक प्रयोग होता है । सतीश दुबे की रचना संस्कार कमल चोपड़ा की जीव हिंसा आदि इस शैली अच्छी रचनाएं है।  [रचनाकाल १९८२के आसपास ]
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Tuesday, October 25, 2016

मै वारी जांवा

मै वारी जांवा
-सीमा जैन
शहर क्या, देश के नामी स्कूल की प्रिंसिपल हमारे घर आई। मेरी खुशी का ठिकाना ही नहीं था।
सोशल साइट पर किसी से मैं बात कर रही थी। फोन को एक तरफ पटका और मैडम जी से बात करने बैठ गई।
मैडम जी ने ही बात शुरू की-"क्या करती है आप रिया जी?"
-"जी, एक कम्पनी का एकाउंट्स देखती हूँ।"
-"फिर तो हिसाब की बहुत पक्की होगी आप!"
-"जी मैडम मैंने m.com. में टॉप किया था।"
-"मैंने तो आज देखा, आप लेखिका और कवयित्री भी हैं। कैसे कर लेती हैं ये सब?घर की जिम्मेदारी, काम के बाद कैसे समय निकाल लेती हैं?"
-"क्या करे मैडम, सब करना पड़ता है। अब हुनर है तो..."
-"आपकी कविता, कहानी कई पत्रिकाओं में प्रकाशित होती है। मैंने आज पहली बार आपके अकाउंट को देखा।"
-"अरे, पर आपने कोई कमेंट तो नहीं दिया !"
-"आज सालों बाद अपना अकाउंट खोला था। देखा, आपके तो मित्रों की भरमार है।कमेंट करना तो भूल गई आपके मित्रों की लम्बी लिस्ट देखकर।"
(बहुत अच्छा लगा ये सुनकर की मैडम ने मेरी हैसियत देखी । वो भी समझ गई होंगी कि मै कोई छोटी-मोटी नहीं, बड़ी लेखिका हूँ)
-"अब ये रोज़ का रिश्ता है मैडम, सबसे निभाना पड़ता है तो दोस्त बन ही जाते हैं।"
-"आपके हर दो दिन में बदलते प्रोफाइल फोटो को तो जबरदस्त लाइक मिलते हैं।कभी पेड़ के पीछे तो कभी झरने के नीचे; आप तो अपने बचपन की हो या परिवार की, हर खुशी और याद सबसे साझा करती हैं। यहाँ तक की भोग की थाली की फोटो लगाना भी नही भूलती हैं।"
(आज तो दिल कर रहा था अपने सारे कमेंट्स मैडम जी पर वार दूँ।)
खुशी को छुपाते हुए मैने कहा-"अब ये साइट भी हमारे परिवार जैसी ही हो जाती है।"
-"रिया जी, घर, नौकरी के बाद अपने हुनर को वक्त देना एक बात है और सोशल साइट के बगैर सांस भी न लेना दूसरी बात है। इस सब के बीच में बच्चों का भविष्य आता है, उसको सिर्फ लाइक नहीं उसपर कमेंट करना भी जरूरी है।"
(ये अचानक बात करते-करते मैडम जी का मूड़ क्यों बदल गया?)
-"रिया जी, आपने ये नहीं पूछा कि मै यहाँ आई क्यों? मैं यहाँ आपकी बेटी, जो सातवीं में मेरी बेटी की ही कक्षा में है, उसके बारे में बात करने आई हूँ।"
-"क्यों, क्या हो गया मेरी पारुल को? वो तो शहर के सबसे अच्छे स्कूल में पढ़ती है।"
-" स्कूल चाहे जैसा हो, आपकी जिम्मेदारी किसी भी हालात में कम नहीं हो सकती है! ये देखिये पारुल का वीडियो जो उसने मेरी बेटी को भेजा है। फ़र्क सिर्फ इतना ही है कि वो ये फोटो आपसे छुपाएगी और आप अपने फोटो...."
अब मैडम के हाथ से मैंने फोन छीन लिया और वीडियो देखकर मेरी आँखों से आँसू बहने लगे।अब मुझे मिलने वाले लाइक और आंसुओ में जंग शुरू हो गई।अकाउंट्स में टॉप करने वाली माँ, अब ये हिसाब ठीक से रख पायेगी क्या?
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Thursday, June 23, 2016

दो मुर्दे


 दो मुर्दे

 मालती बसंत

दो मुर्दे थे .पास –पास ही उनकी कब्रें थीं .एक नया आया था और दूसरे को आए चर पाँच दिन हो चुके थे .नये ने पुराने मुर्दे से पूछा –भाई ,यह जगह कैसी है ?तुमको कोई कष्ट तो नहीं है ?
नहीं ,इस जगह तो मौज ही मौज है ,कष्ट का नाम नहीं ,आबहवा भी  अच्छी है.
तब तो ठीक है .कहकर नये मुर्दे ने शांति की साँस ली .फिर अचानक उसने नया सवाल किया –तुम्हारे अलावा और कौन –कौन है यहाँ ?
हाँ ,है तो बहुत लोग पर अपनी उनसे पटती नहीं है .जैसे तुम आए हो ,वैसे ही कभी –कभी कोई न कोई आ जाता है .
वैसे तो मैं किसी से नहीं डरता ,पर वो एक जिन्दा आदमी है अब्दुल्ला नाम का .अरे वही जिसकी शहर में किराने की दुकान है ?
हाँ-हाँ ,  मैं उसे अच्छी तरह पहचानता हूँ .उसका तो खूब उधार खा कर मरा हूँ .मुझे भी उसी का डर लगता है .वह मर गया तो इसी कब्रिस्तान में आयेगा ,और फिर तकाजा करेगा ,तो अपना क्या होगा ?वो आ गया तो नींद हराम हो जायेगी .वो चैन से सोने नहीं देगा .
इस पर पहला हँस पड़ा .दोनों पक्के दोस्त बन गए .
रात बढ़ गई थी .चाँदनी रात थी .दोनों को नींद नहीं आ रही थी ,पुराने ने नये से कहा –चलो थोड़ा टहल आएँ .नये ने स्वीकृति दे दी .

घूमते – घूमते वे अचानक रुक गए .चार  जिन्दा आदमी एक मुर्दे को ला रहे थे .दोनों बहुत खुश हुए ,चलो एक साथी और आया .जैसे ही उन जिन्दा आदमियों ने उस मुर्दे के चेहरे से कफ़न उठाया ,दोनों ने उसकी सूरत देखी तो भाग खड़े हुए ,यह कहते-अरे रे मर गए यह अब्दुल्ला आ गया .वे शीघ्र अपनी कब्रों में छिप गए .उनकी आँखों में डर समाया  हुआ था .उनकी धडकने तेज हो गई थी . 

Friday, March 4, 2016

ऊंचाइयां

ऊंचाइयां


कमल चोपडा



--यह असम्भव है

--मगर क्यों ?

--मेरे बापू कट्टर हिंदू हैं .वे अपनी लडकी का विवाह एक नीच जाति के लडके के साथ कभी नहीं

होने देंगे. वे कहते हैं.....मैं तेरे लिए कोई ऊंची जाति का लडका देखूंगा

--अगर तुम राजी हो तो मैं तुम्हारे बापू से बात करके देखूं  ?

--मैं तो राजी हूँ पर ...बापू ...यह असम्भव है

अपूर्व असीमा के बापू से मिला और बोला –बापू मैं चालीस बीघे जमीन का मालिक हूँ .इसके 

अतिरिक्त एक फैक्टरीहै और शहर में दो कोठियां हैं.मैं एम ए तक पढ़ा हूँ .मैं आपकी पुत्री से शादी 
...

--इतना साधन संपन्न लडका हमें मिल जाए तो मुझे और क्या चाहिए ?

--सोच लीजिए मैं नीची जाति का हूँ .

--ऊंच –नीच कहे की बेटा और फिर धन दौलत ही...मेरा मतलब तुमसे ऊंचा लडका हमें कहाँ 
मिलेगा ?

और वह अपनी निम्न वर्गीय झेंप मिटाने के लिए –हैं ..हैं ..हैं  करने लगे .
(हालात 1981)


Monday, December 21, 2015

आग्रह


सतीश राठी
सुनो ,माँ का पत्र आया है .बच्चों सहित घर बुलाया है ---कुछ दिनों के लिए घर हो आते है .बच्चों की
छुट्टियां भी है .पति ने कहा .
मैं नहीं जाऊँगी उस नरक में सड़ने के लिए .फिर तुम्हारा गाँव तो गन्दा है ही ,तुम्हारे गाँव के और घर
के लोग कितने गंदे है !पत्नी ने तीखे और चिडचिडे स्वर में प्रत्युतर दिया .
मगर तुम पूरी बात तो सुनो .पति कुछ हिसाब लगाते हुए बोले ,माँ ने लिखा है कि बहू आ
जायगी तो बहू को गले की चेन बनवाने की इच्छा है.इस बार फसल भी अच्छी है .
अब आप कह रहे हैं और मान का इतना आग्रह है तो चलिए ,मिल आते हैं और हाँ –फसल

अच्छी है तो मांजी से कहकर दो बोर गेहूं भी लेते आएँगे . पत्नी ने उल्लास के स्वर में कहा . 

Thursday, November 19, 2015

हराम का खाना














श्याम बिहारी श्यामल

चमरू की नवोढ़ा पतोहू गोइठे की टोकरी माथे पर लिए सामने वाली सड़क से जा  रही थी.रघु बाबू ने पत्नी से कहा –देखो मैंने कहा था न कि गरीबों की बहुओं को कोई क्या देखने जायगा !        वह तो दो चार दिनों में गोइठा चुनने ,पानी भरने के लिए निकलेगी ही .                     यह बात चमरू की पतोहू ने सुन ली .बात उसे लग गयी .                               
-हाँ बाबूजी ,हम लोग कोई हराम का तो खाती नहीं हैं कि महावर लगाकर घर में बैठी रहूँगी .काम  करने पर ही पेट भरेगा . चमरू की पतोहू ने रघु बाबू को सुनाकर कहा और पूरे विश्वास के साथ आगे बढ़ गई .                                                         
रघु बाबु सिठियाये से उसे जाते देखते रह गए .

Monday, September 7, 2015

ये पत्र ,ये लोग

ये पत्र ,ये लोग 

शशांक  आदर्श 


राधेश्याम के परलोक सिधारने के दो घंटे बाद उनके प्रिय भतीजे ने शोक विह्वल होकर दो पत्र लिखे ,पहला पत्र स्नेही जनों के नाम था -
"बंधु ,अत्यन्त दुख के साथ लिखना पड़ रहा है कि चाचाजी का देहावसान  हो गया है। हाय !अब मुझ अनाथ को कौन सहारा देगा। "
 तथा दूसरा पत्र अपनी प्रियतमा के नाम - "प्रिये ,चलो बुड्ढ़ा खिसका ,भगवान को लाख लाख शुक्रिया। जायदाद मेरे नाम हो गई है ,अब हम
शीघ्र ही शादी करने का विचार ले सकते है। "

Saturday, July 11, 2015

इज्जत

इज्जत
अंजना अनिल
खजानो बड़ी हडबडी में एक गठरी सी लेकर आँगन में आयी तो बेटे ने पूछ लिया –कहाँ जा रही हो माँ ? -कहीं नहीं ,तू यहीं बैठ .खजानो ने गठरी छुपा लेने की कोशिश करते हुए कहा –मैं अभी आती हूँ .—यह तुम्हारे हाथ में क्या है ?
-कुछ नहीं ....कुछ भी तो नहीं ! कहती खजानो चोर की तरह बाहर निकल गई .
गठरी में खजानो की दो पुरानी सलवारें और एक साडी थी .गली में आकर वह पड़ोस के मकानको घूर कर बुदबुदाने लगी ,--कमबख्त ! पता नहीं अपने आप को क्या समझते हैं ..हम गरीब सही पर किसी से मांग कर तो नहीं खाते ...कटोरी लेते हैं तो कटोरी दे भी देते हैं ...अपना ओढते है ...अपना पहनते हैं ..फिर भी इनकी नजर हम पर लगी रहती है ...मर तो नहीं गए हम ..अभी हिम्मत बाकी है .
दोपहर को खजानो अपने लापता पति को खोज खबर लेकर निराश सी वापस आ रही थी तो घर पहुंचते पहुंचते सोचा कि पड़ोसन से थोडा आटा मांग ले ताकि बेटे को तो कम से कम खिला पिला दे .परन्तु वह पड़ोसन कि दहलीज पर ही ठिठक गई .वो अपनी बर्तन मांजने वाली से कह रही थी –खजानो के घर को जानती हो,चार दिन से अंगीठी नहीं जली.
यह सच था मगर खजानो तिलमिला गयी थी .
वापिस आकर खजानो ने आखिर अंगीठी जला कर दहलीज पर रख ही दी .रसोई में पड़े टीन कनस्तर खाली भन भनारहे थे ...पर  अंगीठी थी कि पूरी तरह भभक रही थी .ऐसे में बेटे से रहा नहीं गया ,बोला –माँ पिताजी का कोई पता ठिकाना नहीं ..घर में कहीं अन्न का दाना नहीं दिखाई दे रहा ,तुझे फिक्र है क्या  ? बता अंगीठी पर क्या धरेगी ?
--बेवकूफ ! तमाचा जड़दिया खजानो ने उसके गाल पर .
--धीरे बोल ...इज्जत के लिए सब कुछ करना पडता है!


Tuesday, June 16, 2015

काला सूरज



काला सूरज

अनिल चौरसिया
-मैं सूरज हूँ .उन्होंने कहा .
कल्लू ने सोचा ,मुझे क्या एतराज हो सकता है .
नहीं शायद उसने कुछ नहीं सोचा. फालतू लफड़े में कौन पड़े ? उसे तो बस काम करना है .काम करता रहा .
अचानक उसे बीमारी ने आ घेरा .अजीब सी बीमारी –जबान को लकवा मार गया .उसने हिम्मत नहीं हारी .जबान का काम आँखों से लेना चाहा .आँखों की भाषा सुनना किसी के बस की बात नहीं .उन्होंने जब देखा कि अदना सा कल्लू दु:साहस करके जबान कि बजाय आँखों से बोलने कि कोशिश कर रहा है तो गुस्से में आकर उसकी आँखों कि रोशनी भी छीन ली .
कल्लू प्रसन्न था –अब केवल सुन सकता था .केवल सुनने वाले को हर कोई पसंद करता है ,पत्नी भी !उसने फिर सुना,कोई कह रहा था –मैं सूरज हूँ !
उसने देखना चाहा ,आँखों में कालापन  था .कहीं सूरज काला तो नहीं हो गया –शायद !
छोटी- बड़ी बातें संपादक महावीर प्रसाद जैन /जगदीश कश्यप (१९७९ )

Saturday, May 23, 2015

आठवें दशक की लघुकथाएँ

पहचान  
लक्ष्मेंद्र चोपड़ा
अंतिम यात्रा की तैयारियां हो रही थी। पूरा परिवार बहुत दुखी था। उसका दुःख देखकर तो अनजान भी दुखी हो जाता। वह जार जार रो रहा था ,
उसके जीवन का सब कुछ चला गया था। अपना होश हवास तक नहीं था उसे।
'चलो अंतिम दर्शन कर लो 'परिवार के बूढ़े पुरोहित ने अंतिम दर्शन की रस्में शुरू कर दी। पुरोहित श्लोक पढता जाता ;समझाता 'दुखी मत हो ,
बेटा पांव छू लो और हट जाओ.'आखिर वह भी दुःख से टूटा बेहोश सा आया। उसकी रुलाई थम नहीं रही थी।
पुरोहित की समझाइश सुनते ही चौंका ,सीधा तन के खड़ा हो गया,कड़क कर बोला -; बक रहे हैं पंडितजी मैं और इसके पाँव छूऊँगा अपनी
बीबी के ---आपका दिमाग तो ठीक है ?'  



(आठवें दशक की लघुकथाएँ संपादक सतीश दुबे प्रकाशन वर्ष 1979 )

Monday, February 9, 2015

·                     उसकी मौत
·                     मधुदीप
·                      
·                     लाल चौक के दायीं ओर दुकन के सामने बरामदेमें एक लाश पडी थी  आते- जाते लोग दो पल को कौतूहलवश वहां ठहर रहे थे।
·                     ;क्या हुआ   कैसे हुआ    पूछने पर  कोई स्थल दर्शक अपनी आवाज में दर्द घोलता है -राह चलते इस व्यक्ति को हार्ट अटैक हुआ।
·                     कोई कुछ करे इससे पहले ही इअसने यहां दम तोड दिया।
·                     ्काफ़ी समय बीत रहा है । एक विलाप करती हुई भीड लाश के चारों ओर एकत्रित होती जा रही है। छाती पीटकर विलापनेवाले
·                     लाश के निकट जोर-जोर से रोनेवाले,उनके पीछे और उदास चेहरा लटकाए अन्त में ! एक चक्रव्यूह-सा बनता जारहा है।
·                     शायद यह मृतक की पत्नी है जो छाती पीटती हुई विलाप कर रही है -हाय रे ! अब इन कच्ची कोंपलों को कौन सभालेगा  !
·                     निकट ही मृतक का बीस वर्षीय लडका मुंह लटकाए सोच रहा है -डैडी जिन्दा रहते तो अगले वर्ष उसकी बी ए पूरी हो जाती।
·                     अब न जाने---"
·                     छोटा लडका उदासी में डूब रहा है -पापा ने वायदा किया था कि इस वर्ष पास होने पर वे उसे साईकल ला देंगे मगर अब--'
·                        दूर उस कोने में खडा वह व्यक्ति जो मृतक को घूरते  हुए पहचानने का प्रयास कर रहा है ,चाय वाला है ।उसके मन में झल्लाहट
·                     उभर रही है-साला ! बाप की दुकान स्मझ कर रोज चाय डबल रोटी खाता था। बीस रुपये है पूरे     क्या अब इसकी मिट्टी से वसूल
·                     करूं ।
·                     सब अपने अपने में उलझे हुए है । शाम करीब आती जा रही है । मुर्दा चीख रहा है कि कोई उसे उठाकर श्मशान तक ले जाने

·                     की भी तो सोचे !